(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.365. अध्यायः 365
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
अतिथिना ब्राह्मणंप्रति श्रेयःसाधनावगमनाय पद्माख्यनागसमीपगमनचोदना॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

अतिथिरुवाच। 12-365-0x(6658)(80597)
उपदेशं तु ते विप्र करिष्येऽहं यथाक्रमम्।
गुरुणा मे यथाख्यातमर्थतत्त्वं तु मे शृणु॥ 12-365-1(80598)
यत्र पूर्वाभिसर्गे वै धर्मचक्रं प्रवर्तितम्।
नैमिषे गोमतीतीरे तत्र नागह्रदो महान्॥ 12-365-2(80599)
समग्रैस्रिदशैस्तत्र इष्टमासीद्द्विजर्षभ।
यत्रेन्द्रातिक्रमं चक्रे माधाता राजसत्तमः॥ 12-365-3(80600)
कृताधिवासो धर्मात्मा तत्र चक्षुःश्रवा महान्।
पद्मनाभो महानागः पद्म इत्येव विश्रुतः॥ 12-365-4(80601)
स वाचा कर्मणा चैव मनसा च द्विजर्षभः।
प्रसादयति भूतानि त्रिविधे वर्त्मनि स्थितः॥ 12-365-5(80602)
साम्ना भेदेन दानेन दणडेनेति चतुर्विधम्।
पिपमस्थं समस्थं च चक्षुर्ध्यानेन रक्षति॥ 12-365-6(80603)
तमतिक्रम्य विधिना प्रष्टुमर्हसि काङ्क्षित्तम्।
स ते परमकं धर्मं न मिथ्या दर्शयिष्यरति॥ 12-365-7(80604)
स हि सर्वातिथिर्नाणो बुद्धिशास्त्रविशारदः।
गुणैरनुपमैर्युक्तः समस्तैराभिकामिकैः॥ 12-365-8(80605)
प्रकृत्या नित्यसलिलो नित्यमध्ययने रतः।
तपोदमाभ्यां संयुक्तो वृत्तेनानवरेण च॥ 12-365-9(80606)
यज्वा दानपतिः क्षान्तो वृत्ते च परमे स्थितः।
सत्यवागनसूयुश्च शीलवान्नियतेन्द्रियः॥ 12-365-10(80607)
शेषान्नभोक्ता वचनानुकूलो
हितार्जवोत्कृष्टकृताकृतज्ञः।
अवैरकृद्भूतहिते नियुक्तो
गङ्गाह्रदाम्भोभिजनोपपन्नः॥ ॥ 12-365-11(80608)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः॥ 365॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-365-4 चक्षुःश्रवाः सर्पः॥ 12-365-5 त्रिविधे कर्मज्ञानोपास्त्यात्मके॥ 13-365-6 चतुर्विधं यथा स्यात्तया। चक्षुः चक्षुरादि। ध्यानेन वस्तुतत्त्वानुसंधानेन॥ 13-365-7 अतिक्रम्योपगम्य॥ 12-365-8 आभिकामिकैरभीप्सितैः॥


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